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ऋग्वेद 58.11

यत्ते॒ परा॑ः परा॒वतो॒ मनो॑ ज॒गाम॑ दूर॒कम् । तत्त॒ आ व॑र्तयामसी॒ह क्षया॑य जी॒वसे॑ ॥११॥

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