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ऋग्वेद 174.2

अ॒भि॒वृत्य॑ स॒पत्ना॑न॒भि या नो॒ अरा॑तयः । अ॒भि पृ॑त॒न्यन्तं॑ तिष्ठा॒ऽभि यो न॑ इर॒स्यति॑ ॥२॥

पूरा अध्याय