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ऋग्वेद 84.6

नकि॒ष्ट्वद् र॒थीत॑रो॒ हरी॒ यदि॑न्द्र॒ यच्छ॑से ।
नकि॒ष्ट्वानु॑ म॒ज्मना॒ नकि॒ः स्वश्व॑ आनशे ॥६॥

पूरा अध्याय