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ऋग्वेद 67.5

वि यो वी॒रुत्सु॒, रोध॑न्महि॒त्वोत प्र॒जा, उ॒त प्र॒सूष्व॒न्तः ९
चित्ति॑र॒पां, दमे॑ वि॒श्वायु॒ः सद्मे॑व॒ धीरा॑ः, सं॒माय॑ चक्रुः ॥५॥

पूरा अध्याय