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ऋग्वेद 170.3

किं नो॑ भ्रातरगस्त्य॒ सखा॒ सन्नति॑ मन्यसे ।
वि॒द्मा हि ते॒ यथा॒ मनो॒ ऽस्मभ्य॒मिन्न दि॑त्ससि ॥३॥

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