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श्रीरामचरितमानस 81.2

जो नहिं देखा नहिं सुना जो मनहूँ न समाइ।
सो सब अद्भुत देखेउँ बरनि कवनि बिधि जाइ ॥80(क)॥

पूरा अध्याय