ग्रंथश्रीरामचरितमानसउत्तरकाण्डदोहा 22.2श्रीरामचरितमानस 2.2राम बिरह सागर महँ भरत मगन मन होत। बिप्र रूप धरि पवन सुत आइ गयउ जनु पोत ॥1(क)॥पिछलाअगलापूरा अध्याय