ग्रंथश्रीरामचरितमानसउत्तरकाण्डदोहा 1818.3श्रीरामचरितमानस 18.3तब अंगद उठि नाइ सिरु सजल नयन कर जोरि। अति बिनीत बोलेउ बचन मनहुँ प्रेम रस बोरि ॥17(ख)॥पिछलापूरा अध्याय