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श्रीरामचरितमानस 15.5

बहु रोग बियोगन्हि लोग हए। भवदंघ्रि निरादर के फल ए।।
भव सिंधु अगाध परे नर ते। पद पंकज प्रेम न जे करते ॥5॥

पूरा अध्याय