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श्रीरामचरितमानस 126.2

तासु चरन सिरु नाइ करि प्रेम सहित मतिधीर।
गयउ गरुड़ बैकुंठ तब हृदयँ राखि रघुबीर ॥125(क)॥

पूरा अध्याय