ग्रंथश्रीरामचरितमानसउत्तरकाण्डदोहा 123123.3श्रीरामचरितमानस 123.3मसकहि करइ बिंरंचि प्रभु अजहि मसक ते हीन। अस बिचारि तजि संसय रामहि भजहिं प्रबीन ॥122(ख)॥पिछलापूरा अध्याय