ग्रंथश्रीरामचरितमानसउत्तरकाण्डदोहा 123123.2श्रीरामचरितमानस 123.2उबारि मथें घृत होइ बरु सिकता ते बरु तेल। बिनु हरि भजन न भव तरिअ यह सिद्धांत अपेल ॥122(क)॥पिछलाअगलापूरा अध्याय