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श्रीरामचरितमानस 113.2

तुरत भयउँ मैं काग तब पुनि मुनि पद सिरु नाइ।
सुमिरि राम रघुबंस मनि हरषित चलेउँ उड़ाइ ॥112(क)॥

पूरा अध्याय