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दोहा 71

71.1

चौपाई

भागे भालु बलीमुख जूथा। बृकु बिलोकि जिमि मेष बरूथा।।
चले भागि कपि भालु भवानी। बिकल पुकारत आरत बानी।।
यह निसिचर दुकाल सम अहई। कपिकुल देस परन अब चहई।।
कृपा बारिधर राम खरारी। पाहि पाहि प्रनतारति हारी।।
सकरुन बचन सुनत भगवाना। चले सुधारि सरासन बाना।।
राम सेन निज पाछैं घाली। चले सकोप महा बलसाली।।
खैंचि धनुष सर सत संधाने। छूटे तीर सरीर समाने।।
लागत सर धावा रिस भरा। कुधर डगमगत डोलति धरा।।
लीन्ह एक तेहिं सैल उपाटी। रघुकुल तिलक भुजा सोइ काटी।।
धावा बाम बाहु गिरि धारी। प्रभु सोउ भुजा काटि महि पारी।।
काटें भुजा सोह खल कैसा। पच्छहीन मंदर गिरि जैसा।।
उग्र बिलोकनि प्रभुहि बिलोका। ग्रसन चहत मानहुँ त्रेलोका।।

71.2

दोहा/सोरठा

करि चिक्कार घोर अति धावा बदनु पसारि।
गगन सिद्ध सुर त्रासित हा हा हेति पुकारि ॥70॥

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