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दोहा 70

70.1

चौपाई

कुंभकरन मन दीख बिचारी। हति धन माझ निसाचर धारी।।
भा अति क्रुद्ध महाबल बीरा। कियो मृगनायक नाद गँभीरा।।
कोपि महीधर लेइ उपारी। डारइ जहँ मर्कट भट भारी।।
आवत देखि सैल प्रभू भारे। सरन्हि काटि रज सम करि डारे।।।
पुनि धनु तानि कोपि रघुनायक। छाँड़े अति कराल बहु सायक।।
तनु महुँ प्रबिसि निसरि सर जाहीं। जिमि दामिनि घन माझ समाहीं।।
सोनित स्त्रवत सोह तन कारे। जनु कज्जल गिरि गेरु पनारे।।
बिकल बिलोकि भालु कपि धाए। बिहँसा जबहिं निकट कपि आए।।

70.2

दोहा/सोरठा

महानाद करि गर्जा कोटि कोटि गहि कीस।
महि पटकइ गजराज इव सपथ करइ दससीस ॥69॥

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