श्रीरामचरितमानस 61.1
तात कुसल कहु सुखनिधान की। सहित अनुज अरु मातु जानकी।।
कपि सब चरित समास बखाने। भए दुखी मन महुँ पछिताने।।
अहह दैव मैं कत जग जायउँ। प्रभु के एकहु काज न आयउँ।।
जानि कुअवसरु मन धरि धीरा। पुनि कपि सन बोले बलबीरा।।
तात गहरु होइहि तोहि जाता। काजु नसाइहि होत प्रभाता।।
चढ़ु मम सायक सैल समेता। पठवौं तोहि जहँ कृपानिकेता।।
सुनि कपि मन उपजा अभिमाना। मोरें भार चलिहि किमि बाना।।
राम प्रभाव बिचारि बहोरी। बंदि चरन कह कपि कर जोरी।।