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श्रीरामचरितमानस 53.1

नभ चढ़ि बरष बिपुल अंगारा। महि ते प्रगट होहिं जलधारा।।
नाना भाँति पिसाच पिसाची। मारु काटु धुनि बोलहिं नाची।।
बिष्टा पूय रुधिर कच हाड़ा। बरषइ कबहुँ उपल बहु छाड़ा।।
बरषि धूरि कीन्हेसि अँधिआरा। सूझ न आपन हाथ पसारा।।
कपि अकुलाने माया देखें। सब कर मरन बना एहि लेखें।।
कौतुक देखि राम मुसुकाने। भए सभीत सकल कपि जाने।।
एक बान काटी सब माया। जिमि दिनकर हर तिमिर निकाया।।
कृपादृष्टि कपि भालु बिलोके। भए प्रबल रन रहहिं न रोके।।

पूरा अध्याय