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श्रीरामचरितमानस 117.5

करेहु कल्प भरि राजु तुम्ह मोहि सुमिरेहु मन माहिं।
पुनि मम धाम पाइहहु जहाँ संत सब जाहिं ॥116(घ)॥

पूरा अध्याय