ग्रंथश्रीरामचरितमानसलङ्काकाण्डदोहा 115115.3श्रीरामचरितमानस 115.3परम प्रीति कर जोरि जुग नलिन नयन भरि बारि। पुलकित तन गदगद गिराँ बिनय करत त्रिपुरारि ॥114(ख)॥पिछलापूरा अध्याय