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श्रीरामचरितमानस 115.2

सुमन बरषि सब सुर चले चढ़ि चढ़ि रुचिर बिमान।
देखि सुअवसरु प्रभु पहिं आयउ संभु सुजान ॥114(क)॥

पूरा अध्याय