ग्रंथश्रीरामचरितमानसलङ्काकाण्डदोहा 114114.7श्रीरामचरितमानस 114.7कोउ ब्रह्म निर्गुन ध्याव। अब्यक्त जेहि श्रुति गाव।। मोहि भाव कोसल भूप। श्रीराम सगुन सरूप ॥7॥पिछलाअगलापूरा अध्याय