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दोहा 106

106.1

चौपाई

मंदोदरी बचन सुनि काना। सुर मुनि सिद्ध सबन्हि सुख माना।।
अज महेस नारद सनकादी। जे मुनिबर परमारथबादी।।
भरि लोचन रघुपतिहि निहारी। प्रेम मगन सब भए सुखारी।।
रुदन करत देखीं सब नारी। गयउ बिभीषनु मन दुख भारी।।
बंधु दसा बिलोकि दुख कीन्हा। तब प्रभु अनुजहि आयसु दीन्हा।।
लछिमन तेहि बहु बिधि समुझायो। बहुरि बिभीषन प्रभु पहिं आयो।।
कृपादृष्टि प्रभु ताहि बिलोका। करहु क्रिया परिहरि सब सोका।।
कीन्हि क्रिया प्रभु आयसु मानी। बिधिवत देस काल जियँ जानी।।

106.2

दोहा/सोरठा

मंदोदरी आदि सब देइ तिलांजलि ताहि।
भवन गई रघुपति गुन गन बरनत मन माहि ॥105॥

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