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दोहा 295

295.1

चौपाई

भरत बचन सुनि देखि सुभाऊ। सहित समाज सराहत राऊ।।
सुगम अगम मृदु मंजु कठोरे। अरथु अमित अति आखर थोरे।।
ज्यौ मुख मुकुर मुकुरु निज पानी। गहि न जाइ अस अदभुत बानी।।
भूप भरत मुनि सहित समाजू। गे जहँ बिबुध कुमुद द्विजराजू।।
सुनि सुधि सोच बिकल सब लोगा। मनहुँ मीनगन नव जल जोगा।।
देवँ प्रथम कुलगुर गति देखी। निरखि बिदेह सनेह बिसेषी।।
राम भगतिमय भरतु निहारे। सुर स्वारथी हहरि हियँ हारे।।
सब कोउ राम पेममय पेखा। भउ अलेख सोच बस लेखा।।

295.2

दोहा/सोरठा

रामु सनेह सकोच बस कह ससोच सुरराज।
रचहु प्रपंचहि पंच मिलि नाहिं त भयउ अकाजु ॥294॥

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