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दोहा 292

292.1

चौपाई

सो सुखु करमु धरमु जरि जाऊ। जहँ न राम पद पंकज भाऊ।।
जोगु कुजोगु ग्यानु अग्यानू। जहँ नहिं राम पेम परधानू।।
तुम्ह बिनु दुखी सुखी तुम्ह तेहीं। तुम्ह जानहु जिय जो जेहि केहीं।।
राउर आयसु सिर सबही कें। बिदित कृपालहि गति सब नीकें।।
आपु आश्रमहि धारिअ पाऊ। भयउ सनेह सिथिल मुनिराऊ।।
करि प्रनाम तब रामु सिधाए। रिषि धरि धीर जनक पहिं आए।।
राम बचन गुरु नृपहि सुनाए। सील सनेह सुभायँ सुहाए।।
महाराज अब कीजिअ सोई। सब कर धरम सहित हित होई।।

292.2

दोहा/सोरठा

ग्यान निधान सुजान सुचि धरम धीर नरपाल।
तुम्ह बिनु असमंजस समन को समरथ एहि काल ॥291॥

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