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दोहा 52

52.1

चौपाई

बिष्नु जो सुर हित नरतनु धारी। सोउ सर्बग्य जथा त्रिपुरारी।।
खोजइ सो कि अग्य इव नारी। ग्यानधाम श्रीपति असुरारी।।
संभुगिरा पुनि मृषा न होई। सिव सर्बग्य जान सबु कोई।।
अस संसय मन भयउ अपारा। होई न हृदयँ प्रबोध प्रचारा।।
जद्यपि प्रगट न कहेउ भवानी। हर अंतरजामी सब जानी।।
सुनहि सती तव नारि सुभाऊ। संसय अस न धरिअ उर काऊ।।
जासु कथा कुभंज रिषि गाई। भगति जासु मैं मुनिहि सुनाई।।
सोउ मम इष्टदेव रघुबीरा। सेवत जाहि सदा मुनि धीरा।।

52.2

छंद

मुनि धीर जोगी सिद्ध संतत बिमल मन जेहि ध्यावहीं।
कहि नेति निगम पुरान आगम जासु कीरति गावहीं।।
सोइ रामु ब्यापक ब्रह्म भुवन निकाय पति माया धनी।
अवतरेउ अपने भगत हित निजतंत्र नित रघुकुलमनि।।

52.3

दोहा/सोरठा

लाग न उर उपदेसु जदपि कहेउ सिवँ बार बहु।
बोले बिहसि महेसु हरिमाया बलु जानि जियँ ॥51॥

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