Utshovऐप डाउनलोड करें

दोहा 359

359.1

चौपाई

नीदउँ बदन सोह सुठि लोना। मनहुँ साँझ सरसीरुह सोना।।
घर घर करहिं जागरन नारीं। देहिं परसपर मंगल गारीं।।
पुरी बिराजति राजति रजनी। रानीं कहहिं बिलोकहु सजनी।।
सुंदर बधुन्ह सासु लै सोई। फनिकन्ह जनु सिरमनि उर गोई।।
प्रात पुनीत काल प्रभु जागे। अरुनचूड़ बर बोलन लागे।।
बंदि मागधन्हि गुनगन गाए। पुरजन द्वार जोहारन आए।।
बंदि बिप्र सुर गुर पितु माता। पाइ असीस मुदित सब भ्राता।।
जननिन्ह सादर बदन निहारे। भूपति संग द्वार पगु धारे।।

359.2

दोहा/सोरठा

कीन्ह सौच सब सहज सुचि सरित पुनीत नहाइ।
प्रातक्रिया करि तात पहिं आए चारिउ भाइ ॥358॥

Contains text from DharmicData, made available under the Open Database License (ODbL). Simple meanings are written by AI and can contain mistakes.