Utshovऐप डाउनलोड करें

दोहा 357

357.1

चौपाई

भूप बचन सुनि सहज सुहाए। जरित कनक मनि पलँग डसाए।।
सुभग सुरभि पय फेन समाना। कोमल कलित सुपेतीं नाना।।
उपबरहन बर बरनि न जाहीं। स्त्रग सुगंध मनिमंदिर माहीं।।
रतनदीप सुठि चारु चँदोवा। कहत न बनइ जान जेहिं जोवा।।
सेज रुचिर रचि रामु उठाए। प्रेम समेत पलँग पौढ़ाए।।
अग्या पुनि पुनि भाइन्ह दीन्ही। निज निज सेज सयन तिन्ह कीन्ही।।
देखि स्याम मृदु मंजुल गाता। कहहिं सप्रेम बचन सब माता।।
मारग जात भयावनि भारी। केहि बिधि तात ताड़का मारी।।

357.2

दोहा/सोरठा

घोर निसाचर बिकट भट समर गनहिं नहिं काहु।।
मारे सहित सहाय किमि खल मारीच सुबाहु ॥356॥

Contains text from DharmicData, made available under the Open Database License (ODbL). Simple meanings are written by AI and can contain mistakes.