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श्रीरामचरितमानस 351.3

लोक रीत जननी करहिं बर दुलहिनि सकुचाहिं।
मोदु बिनोदु बिलोकि बड़ रामु मनहिं मुसकाहिं ॥350(ख)॥

पूरा अध्याय