दोहा 314
314.1
चौपाई
उपरोहितहि कहेउ नरनाहा। अब बिलंब कर कारनु काहा।।
सतानंद तब सचिव बोलाए। मंगल सकल साजि सब ल्याए।।
संख निसान पनव बहु बाजे। मंगल कलस सगुन सुभ साजे।।
सुभग सुआसिनि गावहिं गीता। करहिं बेद धुनि बिप्र पुनीता।।
लेन चले सादर एहि भाँती। गए जहाँ जनवास बराती।।
कोसलपति कर देखि समाजू। अति लघु लाग तिन्हहि सुरराजू।।
भयउ समउ अब धारिअ पाऊ। यह सुनि परा निसानहिं घाऊ।।
गुरहि पूछि करि कुल बिधि राजा। चले संग मुनि साधु समाजा।।
314.2
दोहा/सोरठा
भाग्य बिभव अवधेस कर देखि देव ब्रह्मादि।
लगे सराहन सहस मुख जानि जनम निज बादि ॥313॥