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दोहा 291

291.1

चौपाई

पहुँचे दूत राम पुर पावन। हरषे नगर बिलोकि सुहावन।।
भूप द्वार तिन्ह खबरि जनाई। दसरथ नृप सुनि लिए बोलाई।।
करि प्रनामु तिन्ह पाती दीन्ही। मुदित महीप आपु उठि लीन्ही।।
बारि बिलोचन बाचत पाँती। पुलक गात आई भरि छाती।।
रामु लखनु उर कर बर चीठी। रहि गए कहत न खाटी मीठी।।
पुनि धरि धीर पत्रिका बाँची। हरषी सभा बात सुनि साँची।।
खेलत रहे तहाँ सुधि पाई। आए भरतु सहित हित भाई।।
पूछत अति सनेहँ सकुचाई। तात कहाँ तें पाती आई।।

291.2

दोहा/सोरठा

कुसल प्रानप्रिय बंधु दोउ अहहिं कहहु केहिं देस।
सुनि सनेह साने बचन बाची बहुरि नरेस ॥290॥

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