दोहा 278
278.1
चौपाई
नाथ करहु बालक पर छोहू। सूध दूधमुख करिअ न कोहू।।
जौं पै प्रभु प्रभाउ कछु जाना। तौ कि बराबरि करत अयाना।।
जौं लरिका कछु अचगरि करहीं। गुर पितु मातु मोद मन भरहीं।।
करिअ कृपा सिसु सेवक जानी। तुम्ह सम सील धीर मुनि ग्यानी।।
राम बचन सुनि कछुक जुड़ाने। कहि कछु लखनु बहुरि मुसकाने।।
हँसत देखि नख सिख रिस ब्यापी। राम तोर भ्राता बड़ पापी।।
गौर सरीर स्याम मन माहीं। कालकूटमुख पयमुख नाहीं।।
सहज टेढ़ अनुहरइ न तोही। नीचु मीचु सम देख न मौहीं।।
278.2
दोहा/सोरठा
लखन कहेउ हँसि सुनहु मुनि क्रोधु पाप कर मूल।
जेहि बस जन अनुचित करहिं चरहिं बिस्व प्रतिकूल ॥277॥