दोहा 265
265.1
चौपाई
सखिन्ह मध्य सिय सोहति कैसे। छबिगन मध्य महाछबि जैसें।।
कर सरोज जयमाल सुहाई। बिस्व बिजय सोभा जेहिं छाई।।
तन सकोचु मन परम उछाहू। गूढ़ प्रेमु लखि परइ न काहू।।
जाइ समीप राम छबि देखी। रहि जनु कुँअरि चित्र अवरेखी।।
चतुर सखीं लखि कहा बुझाई। पहिरावहु जयमाल सुहाई।।
सुनत जुगल कर माल उठाई। प्रेम बिबस पहिराइ न जाई।।
सोहत जनु जुग जलज सनाला। ससिहि सभीत देत जयमाला।।
गावहिं छबि अवलोकि सहेली। सियँ जयमाल राम उर मेली।।
265.2
दोहा/सोरठा
रघुबर उर जयमाल देखि देव बरिसहिं सुमन।
सकुचे सकल भुआल जनु बिलोकि रबि कुमुदगन ॥264॥