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दोहा 240

240.1

चौपाई

नृप सब नखत करहिं उजिआरी। टारि न सकहिं चाप तम भारी।।
कमल कोक मधुकर खग नाना। हरषे सकल निसा अवसाना।।
ऐसेहिं प्रभु सब भगत तुम्हारे। होइहहिं टूटें धनुष सुखारे।।
उयउ भानु बिनु श्रम तम नासा। दुरे नखत जग तेजु प्रकासा।।
रबि निज उदय ब्याज रघुराया। प्रभु प्रतापु सब नृपन्ह दिखाया।।
तव भुज बल महिमा उदघाटी। प्रगटी धनु बिघटन परिपाटी।।
बंधु बचन सुनि प्रभु मुसुकाने। होइ सुचि सहज पुनीत नहाने।।
नित्यक्रिया करि गुरु पहिं आए। चरन सरोज सुभग सिर नाए।।
सतानंदु तब जनक बोलाए। कौसिक मुनि पहिं तुरत पठाए।।
जनक बिनय तिन्ह आइ सुनाई। हरषे बोलि लिए दोउ भाई।।

240.2

दोहा/सोरठा

सतानंदपद बंदि प्रभु बैठे गुर पहिं जाइ।
चलहु तात मुनि कहेउ तब पठवा जनक बोलाइ ॥239॥

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