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दोहा 229

229.1

चौपाई

चहुँ दिसि चितइ पूँछि मालिगन। लगे लेन दल फूल मुदित मन।।
तेहि अवसर सीता तहँ आई। गिरिजा पूजन जननि पठाई।।
संग सखीं सब सुभग सयानी। गावहिं गीत मनोहर बानी।।
सर समीप गिरिजा गृह सोहा। बरनि न जाइ देखि मनु मोहा।।
मज्जनु करि सर सखिन्ह समेता। गई मुदित मन गौरि निकेता।।
पूजा कीन्हि अधिक अनुरागा। निज अनुरूप सुभग बरु मागा।।
एक सखी सिय संगु बिहाई। गई रही देखन फुलवाई।।
तेहि दोउ बंधु बिलोके जाई। प्रेम बिबस सीता पहिं आई।।

229.2

दोहा/सोरठा

तासु दसा देखि सखिन्ह पुलक गात जलु नैन।
कहु कारनु निज हरष कर पूछहि सब मृदु बैन ॥228॥

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