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दोहा 224

224.1

चौपाई

बोली अपर कहेहु सखि नीका। एहिं बिआह अति हित सबहीं का।।
कोउ कह संकर चाप कठोरा। ए स्यामल मृदुगात किसोरा।।
सबु असमंजस अहइ सयानी। यह सुनि अपर कहइ मृदु बानी।।
सखि इन्ह कहँ कोउ कोउ अस कहहीं। बड़ प्रभाउ देखत लघु अहहीं।।
परसि जासु पद पंकज धूरी। तरी अहल्या कृत अघ भूरी।।
सो कि रहिहि बिनु सिवधनु तोरें। यह प्रतीति परिहरिअ न भोरें।।
जेहिं बिरंचि रचि सीय सँवारी। तेहिं स्यामल बरु रचेउ बिचारी।।
तासु बचन सुनि सब हरषानीं। ऐसेइ होउ कहहिं मुदु बानी।।

224.2

दोहा/सोरठा

हियँ हरषहिं बरषहिं सुमन सुमुखि सुलोचनि बृंद।
जाहिं जहाँ जहँ बंधु दोउ तहँ तहँ परमानंद ॥223॥

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