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दोहा 181

181.1

चौपाई

सुख संपति सुत सेन सहाई। जय प्रताप बल बुद्धि बड़ाई।।
नित नूतन सब बाढ़त जाई। जिमि प्रतिलाभ लोभ अधिकाई।।
अतिबल कुंभकरन अस भ्राता। जेहि कहुँ नहिं प्रतिभट जग जाता।।
करइ पान सोवइ षट मासा। जागत होइ तिहुँ पुर त्रासा।।
जौं दिन प्रति अहार कर सोई। बिस्व बेगि सब चौपट होई।।
समर धीर नहिं जाइ बखाना। तेहि सम अमित बीर बलवाना।।
बारिदनाद जेठ सुत तासू। भट महुँ प्रथम लीक जग जासू।।
जेहि न होइ रन सनमुख कोई। सुरपुर नितहिं परावन होई।।

181.2

दोहा/सोरठा

कुमुख अकंपन कुलिसरद धूमकेतु अतिकाय।
एक एक जग जीति सक ऐसे सुभट निकाय ॥180॥

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