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श्रीरामचरितमानस 167.2

होहिं बिप्र बस कवन बिधि कहहु कृपा करि सोउ।
तुम्ह तजि दीनदयाल निज हितू न देखउँ कोउँ ॥166॥

पूरा अध्याय