दोहा 156
156.1
चौपाई
भूप प्रतापभानु बल पाई। कामधेनु भै भूमि सुहाई।।
सब दुख बरजित प्रजा सुखारी। धरमसील सुंदर नर नारी।।
सचिव धरमरुचि हरि पद प्रीती। नृप हित हेतु सिखव नित नीती।।
गुर सुर संत पितर महिदेवा। करइ सदा नृप सब कै सेवा।।
भूप धरम जे बेद बखाने। सकल करइ सादर सुख माने।।
दिन प्रति देह बिबिध बिधि दाना। सुनहु सास्त्र बर बेद पुराना।।
नाना बापीं कूप तड़ागा। सुमन बाटिका सुंदर बागा।।
बिप्रभवन सुरभवन सुहाए। सब तीरथन्ह बिचित्र बनाए।।
156.2
दोहा/सोरठा
जँह लगि कहे पुरान श्रुति एक एक सब जाग।
बार सहस्त्र सहस्त्र नृप किए सहित अनुराग ॥155॥