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दोहा 153

153.1

चौपाई

इच्छामय नरबेष सँवारें। होइहउँ प्रगट निकेत तुम्हारे।।
अंसन्ह सहित देह धरि ताता। करिहउँ चरित भगत सुखदाता।।
जे सुनि सादर नर बड़भागी। भव तरिहहिं ममता मद त्यागी।।
आदिसक्ति जेहिं जग उपजाया। सोउ अवतरिहि मोरि यह माया।।
पुरउब मैं अभिलाष तुम्हारा। सत्य सत्य पन सत्य हमारा।।
पुनि पुनि अस कहि कृपानिधाना। अंतरधान भए भगवाना।।
दंपति उर धरि भगत कृपाला। तेहिं आश्रम निवसे कछु काला।।
समय पाइ तनु तजि अनयासा। जाइ कीन्ह अमरावति बासा।।

153.2

दोहा/सोरठा

यह इतिहास पुनीत अति उमहि कही बृषकेतु।
भरद्वाज सुनु अपर पुनि राम जनम कर हेतु ॥152॥

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