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दोहा 147

147.1

चौपाई

सुनु सेवक सुरतरु सुरधेनु। बिधि हरि हर बंदित पद रेनू।।
सेवत सुलभ सकल सुख दायक। प्रनतपाल सचराचर नायक।।
जौं अनाथ हित हम पर नेहू। तौ प्रसन्न होइ यह बर देहू।।
जो सरूप बस सिव मन माहीं। जेहि कारन मुनि जतन कराहीं।।
जो भुसुंडि मन मानस हंसा। सगुन अगुन जेहि निगम प्रसंसा।।
देखहिं हम सो रूप भरि लोचन। कृपा करहु प्रनतारति मोचन।।
दंपति बचन परम प्रिय लागे। मुदुल बिनीत प्रेम रस पागे।।
भगत बछल प्रभु कृपानिधाना। बिस्वबास प्रगटे भगवाना।।

147.2

दोहा/सोरठा

नील सरोरुह नील मनि नील नीरधर स्याम।
लाजहिं तन सोभा निरखि कोटि कोटि सत काम ॥146॥

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