दोहा 142
142.1
चौपाई
अपर हेतु सुनु सैलकुमारी। कहउँ बिचित्र कथा बिस्तारी।।
जेहि कारन अज अगुन अरूपा। ब्रह्म भयउ कोसलपुर भूपा।।
जो प्रभु बिपिन फिरत तुम्ह देखा। बंधु समेत धरें मुनिबेषा।।
जासु चरित अवलोकि भवानी। सती सरीर रहिहु बौरानी।।
अजहुँ न छाया मिटति तुम्हारी। तासु चरित सुनु भ्रम रुज हारी।।
लीला कीन्हि जो तेहिं अवतारा। सो सब कहिहउँ मति अनुसारा।।
भरद्वाज सुनि संकर बानी। सकुचि सप्रेम उमा मुसकानी।।
लगे बहुरि बरने बृषकेतू। सो अवतार भयउ जेहि हेतू।।
142.2
दोहा/सोरठा
सो मैं तुम्ह सन कहउँ सबु सुनु मुनीस मन लाई।।
राम कथा कलि मल हरनि मंगल करनि सुहाइ ॥141॥