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महाभारत 25.57

ततो ध्वनिर्द्विरदरथाश्वपार्थिवै;र्भयाद्द्रवद्भिर्जनितोऽतिभैरवः
क्षितिं वियद्द्यां विदिशो दिशस्तथा; समावृणोत्पार्थिव संयुगे तदा

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