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महाभारत 36.7

मर्माण्यस्थीनि हृदयं तथासू;न्घोरा वाचो निर्दहन्तीह पुंसाम्
तस्माद्वाचं रुशतीं रूक्षरूपां; धर्मारामो नित्यशो वर्जयीत

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