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महाभारत 172.37

भीष्म उवाच
अजगरचरितं व्रतं महात्मा; य इह नरोऽनुचरेद्विनीतरागः
अपगतभयमन्युलोभमोहः; स खलु सुखी विहरेदिमं विहारम्

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