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महाभारत 172.36

तदहमनुनिशाम्य विप्रयातं; पृथगभिपन्नमिहाबुधैर्मनुष्यैः
अनवसितमनन्तदोषपारं; नृषु विहरामि विनीतरोषतृष्णः

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