ग्रंथमहाभारतशान्तिपर्वअध्याय 118118.21महाभारत 118.21संगृहीतजनोऽस्तब्धः प्रसन्नवदनः सदा दाता भृत्यजनावेक्षी न क्रोधी सुमहामनाःपिछलाअगलापूरा अध्याय