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महाभारत 76.35

वैशंपायन उवाच
एवमुक्तो ययातिस्तु शुक्रं कृत्वा प्रदक्षिणम्
जगाम स्वपुरं हृष्टो अनुज्ञातो महात्मना

पूरा अध्याय