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महाभारत 76.31

ययातिरुवाच
अधर्मो न स्पृशेदेवं महान्मामिह भार्गव
वर्णसंकरजो ब्रह्मन्निति त्वां प्रवृणोम्यहम्

पूरा अध्याय