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महाभारत 184.15

कच्चिन्न शूद्रेण न हीनजेन; वैश्येन वा करदेनोपपन्ना
कच्चित्पदं मूर्ध्नि न मे निदिग्धं; कच्चिन्माला पतिता न श्मशाने

पूरा अध्याय