श्रीमद्भगवद्गीता 6.6
बन्धुरात्माऽऽत्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः।
अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत्।।6.6।।
सरल अर्थ, AI द्वारा लिखा गयाआत्मा अपने आप को आत्मा द्वारा जीतने वाले के लिये मित्र है; जो नहीं जीत पाता, उसके लिये आत्मा शत्रु बन जाता है।